RELOS Agreement (Reciprocal Exchange of Logistics Support)
भारत और रूस के बीच यह सैन्य-लॉजिस्टिक समझौता है।
RELOS पर भारत और रूस के बीच हस्ताक्षर 18 फरवरी 2025 को हुए थे।बाद में इसे रूस की संसद (State Duma) ने मंजूरी दी — यानी इसे औपचारिक रूप से स्वीकार कर लिया गया है।
RELOS Agreement (Reciprocal Exchange of Logistic Support) से भारत और रूस दोनों को कई महत्वपूर्ण फायदे मिलेंगे।
मुख्य फायदे इस प्रकार हैं :-भारत को RELOS से क्या लाभ होंगे
- लॉजिस्टिक सपोर्ट और बेस एक्सेस
RELOS के तहत भारत को रूस के सैन्य अड्डों, बंदरगाहों और वायु-आधारों (ports, airfields, naval / air bases) तक पहुंच मिलेगी, जहाँ भारतीय नौसेना और वायुसेना अपने जहाजों, विमानों व अन्य बलों को ईंधन, मरम्मत, आपूर्ति आदि की सुविधाएं दे सकेंगे।
- दूरस्थ तैनाती व वैश्विक पहुंच
इस समझौते से भारत की नौसैनिक और वायु-शक्ति को सिर्फ हिन्द महासागर (Indian Ocean) या हिंद-प्रशांत तक सीमित नहीं रहना होगा। भारत अब रूस के आर्कटिक एवं प्रशांत क्षेत्र के रॉ-बेस / बंदरगाहों का इस्तेमाल कर सकता है — जिससे उसकी वैश्विक तैनाती व संचालन क्षमता काफी बढ़ जाएगी।
- दूर-दराज के अभियान, मानवीय राहत व संयुक्त अभ्यास में सुविधा
RELOS के तहत न सिर्फ युद्ध या रक्षा-मिशन, बल्कि संयुक्त सैन्य अभ्यास, प्रशिक्षण, मानवीय सहायता (humanitarian aid), आपदा राहत (disaster relief) आदि में भी दोनों देशों को त्वरित व सरल लॉजिस्टिक सपोर्ट मिलेगा।
- हथियारों और अस्त-व्यवस्था (equipment & maintenance) में विश्वसनीयता
भारत के पास जिन कई युद्धक प्रणालियों / हथियारों (fighters, जहाज, आदि) का स्रोत रूस है, RELOS की वजह से उनकी देख-रेख, रख-रखाव, ईंधन, запчасти (spare parts) आदि के लिए रूस-नेटवर्क उपलब्ध रहेगा — जिससे लड़ाकू तत्परता (combat readiness) में सुधार होगा।
भू-रणनीतिक (Strategic / Geopolitical) फायदे
- वैश्विक और ध्रुवीय (Arctic) पहुंच — भारत की रणनीतिक विस्तार क्षमता
आर्कटिक जैसे क्षेत्र में पहुंच से भारत की वैश्विक उपस्थिति और रणनीतिक विकल्पों में वृद्धि होगी। इससे भारत केवल एक क्षेत्रीय शक्ति नहीं, बल्कि अंतरराष्ट्रीय स्तर पर अपनी आवाज़ रख सकेगा।
- स्वतंत्र एवं बहुपक्षीय विदेश-नीति (Strategic Autonomy)
पश्चिमी देश, विशेषकर अमेरिका और उसके सहयोगी, अक्सर रूस के प्रति कड़ा रुख रखते हैं; लेकिन RELOS बताता है कि भारत रूस के साथ अपने रक्षा-सहयोग को सक्रिय रख सकता है — जिससे भारत अपनी विदेश नीति में विविधता बनाए रखेगा।
- समुद्री सुरक्षा व हिंद-प्रशांत क्षेत्र में संतुलन
बंदरगाहों व लॉजिस्टिक नेटवर्क के विस्तार से, भारत अपने नौसैनिक अभियानों को बेहतर तरीके से चला सकेगा; यह विशेष रूप से उन समयों में उपयोगी होगा जब क्षेत्रीय तनाव बढ़ रहे हों, और भारत को समुद्री मार्गों व समुद्री सीमाओं की रक्षा करनी हो।
Reciprocal Exchange of Logistics Support (RELOS) का हिंदी नाम 👉
परस्पर लॉजिस्टिक सहायता विनिमय समझौता
इसे सरल भाषा में ऐसे भी कहा जा सकता है- दो देशों के बीच सैन्य लॉजिस्टिक सहयोग समझौता & परस्पर सैन्य आपूर्ति एवं सहायता समझौता
नीचे RELOS Agreement (भारत–रूस) से जुड़े करेंट अफेयर्स के 5 महत्वपूर्ण प्रश्न-उत्तर हिंदी में दिए जा रहे हैं —
परीक्षा उपयोगी, ताज़ा एवं सरल रूप में👇
Q-1 RELOS Agreement (रेलोस) क्या है ?
उत्तर :- RELOS (Reciprocal Exchange of Logistics Support) भारत और रूस के बीच सैन्य लॉजिस्टिक सहयोग समझौता है, जिसके तहत दोनों देश एक-दूसरे के सैन्य अड्डों, बंदरगाहों और एयरबेस का उपयोग ईंधन, मरम्मत, आपूर्ति और रख-रखाव के लिए कर सकते हैं।
Q-2 भारत और रूस के बीच RELOS Agreement पर हस्ताक्षर कब हुए ?
उत्तर :- भारत और रूस के बीच RELOS Agreement पर 18 फरवरी 2025 को हस्ताक्षर हुए।
Q-3 रूस की संसद State Duma ने RELOS Agreement को कब मंजूरी दी ?
उत्तर :- State Duma ने RELOS Agreement को 03 दिसंबर 2025 को स्वीकृति प्रदान की।
Q-4 RELOS Agreement से भारत को प्रमुख रूप से क्या लाभ होगा ?
उत्तर :- इस समझौते से भारत को रूस के सैन्य बंदरगाह, एयरबेस व लॉजिस्टिक सुविधाओं तक पहुंच मिलेगी, जिससे नौसेना और वायुसेना की दूर-दराज क्षेत्रों में तैनाती और संचालन क्षमता बढ़ेगी, विशेषकर आर्कटिक व प्रशांत क्षेत्र में।
Q-5 RELOS Agreement किस क्षेत्र से संबंधित है ?
उत्तर :- RELOS Agreement रक्षा और सैन्य लॉजिस्टिक सहयोग (Defence & Military Logistics Cooperation) से संबंधित है।
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